Friday, 16 September 2011

धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है...

अपना खो ईमान आदमी तकता चीज परायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निशा  अधर्मी आयी है ||

दोष ढूँढता औरों में जो अपना दोष छिपाने को |
बगली घूँसा मर रहा है अपना काम बनाने को ||
भूल गया रिश्ते नाते इतनी बेशर्मी छाई है|
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||

ऐसे भी तो बहुत मिले हैं जो दानी कहलाते है |
मौका लगते माल दुसरो का भी चट कर जाते हैं ||
करते बात करोडो की पर नहीं जेब में पायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||

बना फिरे बहुरुपिया खोकर आन, मान, निज शान को |
नर पिशाच बन मिटा रहा अपनों के नाम निशान को ||
स्वार्थ बना है सब कुछ उसका भूला सब असनायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||

माँ बहनों की इज्जत का भी वह तो दाब लगाता है |
बहता खून देखकर भी जो जरा नहीं घब्टता है ||
अपने गिरने की खातिर जो "देव" खोद रहा खायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||









Wednesday, 14 September 2011

झूठा गर्व ...

सारे के सारे झूठे हैं, कोई कहता है कि हमे हिंदी भाषा पर गर्व है तो कोई कहता है कि हमें हिंदी बोलने में फक्र महसूस होता है.
सब एक नंबर के चिंदी चोर हैं...अंग्रेजी बोले बिना तो किसी का खाना भी हजम नहीं होता ...
अगर कोई किसी से बोले कि पुरे एक दिन सिर्फ हिंदी भाषा का उपयोग करो तो कोई कर नहीं सकता क्योकि बिना अंग्रेजी के तो कोई वाक्य ही पूरा नहीं कर सकता ..................
भाई लोगो आज के ज़माने में तो यह कहावत मशहुर है कि  हिंदी हमारी माता है और अंग्रेजी हमारी पत्नी.........
क्योकि माता तो उम्र के शुरूआती दिनों में ही काम आती है और पत्नी पुरे जीवन भर .........
इसका उधारण यह है कि अगर किसी व्यक्ति पर अंग्रेजी नहीं आती तो उसे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल सकती ......