Friday, 16 September 2011

धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है...

अपना खो ईमान आदमी तकता चीज परायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निशा  अधर्मी आयी है ||

दोष ढूँढता औरों में जो अपना दोष छिपाने को |
बगली घूँसा मर रहा है अपना काम बनाने को ||
भूल गया रिश्ते नाते इतनी बेशर्मी छाई है|
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||

ऐसे भी तो बहुत मिले हैं जो दानी कहलाते है |
मौका लगते माल दुसरो का भी चट कर जाते हैं ||
करते बात करोडो की पर नहीं जेब में पायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||

बना फिरे बहुरुपिया खोकर आन, मान, निज शान को |
नर पिशाच बन मिटा रहा अपनों के नाम निशान को ||
स्वार्थ बना है सब कुछ उसका भूला सब असनायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||

माँ बहनों की इज्जत का भी वह तो दाब लगाता है |
बहता खून देखकर भी जो जरा नहीं घब्टता है ||
अपने गिरने की खातिर जो "देव" खोद रहा खायी है |
धर्म का सूरज डूब रहा है निंशा अधर्मी आयी है ||









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